प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca |etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||
हे केशव! प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय — इन सबको मैं समझना चाहता हूँ।
व्याख्या
अर्जुन इस अध्याय में तीन जोड़ियों के बारे में पूछता है: प्रकृति (जड़ जगत) और पुरुष (चेतन आत्मा), क्षेत्र (शरीर और उसका संसार) और क्षेत्रज्ञ (उसे जानने वाला), तथा ज्ञान और ज्ञेय। कृष्ण का उत्तर अगले श्लोकों से शुरू होता है। कुछ पांडुलिपि-परंपराओं में यह श्लोक नहीं मिलता, इसलिए कुछ संस्करणों में अध्याय अगले श्लोक से आरंभ होता है।