पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān |kāraṇaṃ guṇasaṅgo'sya sadasadyonijanmasu ||
प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों के प्रति उसकी आसक्ति ही उसके अच्छी और बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
व्याख्या
कृष्ण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की व्याख्या आगे बढ़ा रहे हैं। जीवात्मा (पुरुष) प्रकृति में स्थित होकर उससे उत्पन्न तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) का अनुभव करती है। इन गुणों में आसक्ति (सङ्ग) ही उच्च या निम्न योनियों में पुनर्जन्म का कारण बनती है। कुछ परंपराएँ इस पुरुष को ईश्वर से भिन्न जीव मानती हैं, तो कुछ अंततः परम से अभिन्न; पर सभी आसक्ति को ही बंधन का कारण मानती हैं।