कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने भीतर ही अपने से आत्मा को देखते हैं; कुछ दूसरे सांख्य योग से, और अन्य कर्मयोग से।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जो पुरुष और प्रकृति को सचमुच जान लेता है, वह फिर जन्म नहीं लेता। यहाँ वे आत्मा (आत्मन्) को देखने के अलग-अलग मार्ग बताते हैं: ध्यान, ज्ञान का मार्ग (सांख्य योग) और निष्काम कर्म का मार्ग (कर्मयोग)। कुछ व्याख्याकार सांख्य को आत्मा और जड़ प्रकृति का विवेक मानते हैं, तो कुछ इसे व्यापक रूप से ज्ञानमार्ग के अर्थ में लेते हैं।