कार्य और कारण को उत्पन्न करने में प्रकृति को हेतु कहा जाता है, और सुख-दुःख के भोग में पुरुष को हेतु कहा जाता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि प्रकृति (मूल जड़ स्वभाव) और पुरुष (चेतन जीव) दोनों अनादि हैं। अब वे दोनों का भेद बताते हैं: करने-कराने की सारी क्रिया प्रकृति से होती है, जबकि सुख और दुःख का अनुभव पुरुष करता है। 'कार्य-कारण' को शंकराचार्य की परंपरा शरीर और इंद्रियों के अर्थ में लेती है, जबकि अन्य व्याख्याकार इसे सामान्य रूप से कार्य और कारण मानते हैं।