जैसे सर्वव्यापी आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में हर जगह स्थित आत्मा भी लिप्त नहीं होती।
व्याख्या
क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (उसे जानने वाले) की चर्चा में कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि देह में रहते हुए भी आत्मा उसके सुख-दुख और कर्मों के फल से अछूती रहती है। आकाश हर वस्तु में समाया है, फिर भी वह इतना सूक्ष्म है कि किसी से मैला या बँधा नहीं होता। आत्मा की असंगता इसी प्रकार की है। अद्वैत परंपरा इसे एक ही चैतन्य की स्वाभाविक असंगता मानती है, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत परंपराएँ इसे जीवात्मा का देह और प्रकृति से भिन्न स्वभाव मानती हैं।