iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||
यज्ञ से पोषित देवता तुम्हें मनचाहे भोग देंगे। जो व्यक्ति उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।
व्याख्या
कृष्ण यज्ञ की बात आगे बढ़ाते हैं: जीवन देने और लेने के आपसी संबंध पर चलता है, जिसमें देवता संसार का पोषण करते हैं। जो बिना कुछ लौटाए केवल लेता रहता है, उसे वे चोर कहते हैं। टीकाकार यज्ञ का अर्थ अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे वैदिक कर्मकांड मानते हैं, तो कुछ निष्काम कर्तव्य या सेवा।