न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt |kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ||
कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी कभी कर्म किए बिना नहीं रहता, क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी को विवश करके कर्म में लगा देते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि कर्म न करने मात्र से या केवल संन्यास लेने से सिद्धि नहीं मिलती; यहाँ वे अर्जुन को उसका कारण समझाते हैं। प्रकृति के गुण (प्रकृति के तीन घटक: सत्त्व, रजस् और तमस्) हर प्राणी से कर्म करवाते रहते हैं, इसलिए पूरी तरह निष्क्रिय रहना संभव नहीं है। शंकराचार्य के अनुसार यह बात मुख्यतः उस अज्ञानी पर लागू होती है जो स्वयं को शरीर मानता है, जबकि अन्य टीकाकार इसे हर देहधारी पर समान रूप से लागू मानते हैं।