यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ |bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ||
जो श्रेष्ठ लोग यज्ञ के बाद बचा हुआ अन्न खाते हैं, वे सब प्रकार के दोषों से मुक्त हो जाते हैं। परंतु जो केवल अपने ही लिए पकाते हैं, वे पापी तो पाप ही खाते हैं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को जीवन में यज्ञ की भूमिका समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि पहले देवताओं, दूसरों और समष्टि के लिए अर्पित करके फिर बचा हुआ खाने से मनुष्य दोषों (किल्बिष) से शुद्ध होता है, जबकि केवल अपने लिए पकाना पाप (अघ) खाना है। कुछ परंपराएँ यज्ञ को वैदिक अनुष्ठान मानती हैं, तो कुछ इसे हर निःस्वार्थ और बाँटने वाला कर्म मानती हैं।