सृष्टि के आरंभ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा की रचना की और कहा: "इसी यज्ञ से तुम फलो-फूलो और बढ़ो। यह यज्ञ तुम्हारे लिए इच्छित फल देने वाली कामधेनु बने।"
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि यज्ञ के भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनाता। अब वे बताते हैं कि यज्ञ की परंपरा सृष्टि के साथ ही शुरू हुई, जब सृष्टिकर्ता प्रजापति ने मनुष्यों को यज्ञ का मार्ग दिया। यज्ञ यानी त्यागपूर्वक किया गया अर्पण या कर्तव्य, और "इष्टकामधुक्" का अर्थ है इच्छित फल देने वाला, जैसे मनचाहा दूध देने वाली गाय। शंकराचार्य जैसी परंपराएँ यज्ञ को मुख्यतः वैदिक अनुष्ठान मानती हैं, जबकि कई अन्य व्याख्याएँ इसे निःस्वार्थ सेवा और कर्तव्य-पालन तक फैलाकर समझती हैं।