श्रीकृष्ण
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara | asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ ||
इसलिए तुम आसक्ति छोड़कर सदा वही कर्म करो जो करने योग्य है। क्योंकि आसक्ति के बिना कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या अर्जुन कर्म से पीछे हटना चाहता है; उसके उत्तर में कृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि उसे आसक्ति (सङ्ग) छोड़कर, यानी फल से चिपके बिना, अपना कर्तव्य-कर्म करना चाहिए। ऐसा निष्काम कर्म 'परम' की प्राप्ति कराता है। कुछ व्याख्याकार इस 'परम' को आत्मा का सर्वोच्च स्वरूप या मोक्ष मानते हैं, तो कुछ भगवान की प्राप्ति।
पिछला श्लोक 3.18 अध्याय 3 · कर्म का मार्ग अगला श्लोक 3.20
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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