उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham |saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||
यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सारे लोक नष्ट हो जाएँगे; मैं अव्यवस्था का कर्ता बनूँगा और इन सब प्राणियों का नाश कर बैठूँगा।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि स्वयं उन्हें कुछ पाना शेष न होने पर भी वे कर्म क्यों करते रहते हैं। यदि वे कर्म छोड़ दें, तो लोग उनका अनुसरण करेंगे और व्यवस्था बिगड़ जाएगी; "सङ्कर" का अर्थ मिश्रण या गड़बड़ी है, जिसे प्रायः कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादा की अव्यवस्था माना जाता है। भाव यह है कि जिन्हें लोग आदर्श मानते हैं, उन पर सही आचरण करने का उत्तरदायित्व होता है।