श्रीकृष्ण
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||
क्योंकि हे पार्थ, यदि मैं कभी भी बिना थके कर्म में न लगा रहूँ, तो लोग हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलेंगे।
व्याख्या कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि स्वयं उन्हें कुछ पाना शेष न होने पर भी वे कर्म क्यों करते रहते हैं। लोग श्रेष्ठ व्यक्तियों का अनुकरण करते हैं, इसलिए यदि कृष्ण कर्म छोड़ दें तो दूसरे भी उनका उदाहरण लेकर अपने कर्तव्य छोड़ देंगे। इसका परिणाम अगले श्लोक में बताया गया है।
पिछला श्लोक 3.22 अध्याय 3 · कर्म का मार्ग अगला श्लोक 3.24
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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