अपना धर्म अपूर्ण हो, तब भी दूसरे के भलीभाँति निभाए गए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मर जाना भी कल्याणकारी है, पर दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी बताया कि राग और द्वेष साधना के मार्ग में बाधा हैं। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि अपना धर्म, यानी जीवन में अपना कर्तव्य और भूमिका, दूसरे के धर्म की नकल से अधिक सुरक्षित है, भले ही वह नकल अधिक सुंदर दिखे। परंपरागत टीकाकार स्वधर्म को प्रायः अपने वर्ण के कर्तव्य के रूप में समझते हैं, जबकि कुछ इसे अपने स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य मानते हैं।