आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā |kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca ||
हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी के इस नित्य शत्रु से, जो कामना का रूप लिए हुए है और आग की तरह कभी तृप्त नहीं होता, ज्ञान ढका रहता है।
व्याख्या
अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण यहाँ बताते हैं कि मनुष्य को गलत कर्म की ओर क्या धकेलता है। वे कामना (काम) को ज्ञानी का स्थायी शत्रु कहते हैं, जो ज्ञान को ढक देती है और अग्नि की तरह कितना भी ईंधन मिले, कभी तृप्त नहीं होती। परंपराएँ यहाँ ज्ञान का अर्थ कहीं आत्मज्ञान और कहीं सामान्य विवेक लेती हैं, पर सभी मानती हैं कि कामना स्पष्ट दृष्टि को धुँधला कर देती है।