हर इंद्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष बसे रहते हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे दोनों उसके मार्ग में बाधा डालने वाले लुटेरे हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं, और यहाँ वे अर्जुन को बताते हैं कि इसमें असली खतरा कहाँ है। आँख, कान जैसी हर इंद्रिय के विषय के साथ पसंद (राग) और नापसंद (द्वेष) जुड़ जाती है, और ये दोनों साधक को राह से भटका देते हैं। कुछ व्याख्याकार 'व्यवस्थित' का अर्थ प्रकृति द्वारा हर विषय में पहले से तय मानते हैं, तो कुछ इसे विषय के संपर्क में स्वाभाविक रूप से उठने वाला मानते हैं। दोनों इस पर सहमत हैं कि इनके वश में नहीं आना है।