जान लो कि कर्म ब्रह्म से उत्पन्न होता है, और ब्रह्म अक्षर से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
व्याख्या
कृष्ण यज्ञ के चक्र को समझा रहे हैं, यानी यह विचार कि निःस्वार्थ कर्तव्य-कर्म से संसार चलता है। यहाँ वे कर्म का मूल ब्रह्म में और ब्रह्म का मूल अक्षर में बताकर कहते हैं कि सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में प्रतिष्ठित है। टीकाकार इन शब्दों को अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ ब्रह्म को वेद और अक्षर को परमात्मा मानते हैं, जबकि कुछ ब्रह्म को प्रकृति या शरीर-मन और अक्षर को आत्मा मानते हैं।