सारे कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परंतु जिसका मन अहंकार से मोहित हो गया है, वह मानता है, "मैं ही कर्ता हूँ।"
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कर्म का कर्तापन वास्तव में अहंकार का नहीं है। गुण तीन हैं: सत्त्व (प्रकाश), रजस् (क्रियाशीलता) और तमस् (जड़ता), जिनसे प्रकृति बनी है। जो व्यक्ति अहंकार से जुड़ जाता है, वह प्रकृति की शक्तियों से होने वाले कर्मों का श्रेय स्वयं ले लेता है। अद्वैत परंपरा आत्मा के साक्षी होने पर बल देती है, जबकि भक्ति परंपराएँ अंततः ईश्वर को ही कर्ता मानती हैं।