न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥
na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām |joṣayetsarvakarmāṇi vidvān yuktaḥ samācaran ||
ज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि कर्म में आसक्त अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे। वह स्वयं योग में स्थित रहकर सब कर्म भली-भाँति करता हुआ, उन लोगों को भी कर्मों में लगाए रखे।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग अभी कर्म और उसके फल में आसक्ति (सङ्ग) रखते हैं, उनके साथ ज्ञानी को कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन्हें यह कहकर विचलित नहीं करना चाहिए कि कर्म व्यर्थ है। इसके बजाय ज्ञानी स्वयं स्थिर और संतुलित मन (योग) से सब कार्य अच्छी तरह करके उदाहरण दे। जो लोग अभी भीतरी अनासक्ति के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए भ्रमित होने से बेहतर है कि वे कर्म में लगे रहें।