यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ |ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate ||
परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही तृप्त है और आत्मा में ही पूर्ण संतुष्ट है, उसके लिए करने योग्य कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जो सबके साझा कर्म-चक्र को नहीं चलाता, उसका जीवन व्यर्थ है। यहाँ वे अपवाद बताते हैं: जिसका आनंद, तृप्ति और संतोष पूरी तरह आत्मा (आत्मन्) में है, उसे किसी बाहरी लक्ष्य के लिए कर्म करने की बाध्यता नहीं रहती। परंपराओं में मतभेद है: कुछ इसे आत्मज्ञानी का कर्तव्यों से मुक्त होना मानती हैं, जबकि अन्य कहती हैं कि ऐसा व्यक्ति लोक-कल्याण के लिए सहज भाव से कर्म करता रहता है, जैसा आगे के श्लोकों में दिखता है।