न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiñcana |nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi ||
हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी करना आवश्यक नहीं है, और न ही कुछ ऐसा है जो मुझे पाना बाकी हो और अब तक न मिला हो। फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि लोग श्रेष्ठ व्यक्ति के आचरण का अनुसरण करते हैं। यहाँ वे अपना ही उदाहरण देते हैं: उनके लिए न कोई कर्तव्य शेष है, न कुछ पाना बाकी है, फिर भी वे कर्म करते रहते हैं। अर्जुन के लिए संकेत यह है कि कर्म का कारण अभाव या इच्छा ही हो, यह आवश्यक नहीं।