देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||
इस यज्ञ से तुम देवताओं को पुष्ट करो, और वे देवता तुम्हें पुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।
व्याख्या
कृष्ण बता रहे हैं कि प्रजापति ने यज्ञ (अर्पण और कर्तव्य-भाव से किया गया कर्म) के द्वारा मनुष्यों और देवताओं को आपस में जोड़ा है। मनुष्य यज्ञ से देवताओं (जीवन और प्रकृति के पीछे कार्यरत दिव्य शक्तियों) को पुष्ट करते हैं, और देवता बदले में मनुष्यों को। इस पारस्परिक पोषण (भावना) से परम कल्याण (श्रेयस्) मिलता है। कुछ परंपराएँ देवताओं को शाब्दिक रूप में लेती हैं, तो कुछ उन्हें प्रकृति की शक्तियाँ या हमारे भीतर की शक्तियाँ मानती हैं।