indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate |etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||
इन्द्रियों, मन और बुद्धि को इस (काम) का निवास-स्थान कहा गया है। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी जीव को मोह में डाल देता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है; कृष्ण उत्तर में काम (कामना) को ज्ञानियों का नित्य शत्रु बता चुके हैं। यहाँ वे कहते हैं कि यह इन्द्रियों, मन और बुद्धि में टिककर इन्हीं के सहारे ज्ञान को ढक देता है और देहधारी को भ्रमित करता है। टीकाकार इसे अलग-अलग ढंग से समझाते हैं कि ये तीनों काम के स्थान हैं या उसके फैलने की सीढ़ियाँ, पर सभी मानते हैं कि वह भीतर से ही काम करता है।