इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, तुम पहले इन्द्रियों को वश में करो, और फिर ज्ञान तथा विज्ञान का नाश करने वाले इस पाप को नष्ट कर दो।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा है कि कामना (काम) इन्द्रियों, मन और बुद्धि में बसकर ज्ञान को ढक लेती है। यहाँ वे निष्कर्ष देते हैं: पहले इन्द्रियों को संयम में लाओ, फिर कामना रूपी 'पाप्मा' को जड़ से मिटाओ। 'ज्ञान' और 'विज्ञान' को परंपराएँ अलग-अलग समझती हैं: कोई शास्त्रीय ज्ञान और उसका प्रत्यक्ष अनुभव मानता है, कोई आत्मज्ञान और जगत् का ज्ञान।