ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ ||
परन्तु जो लोग मेरे इस मत में दोष निकालते हुए इसका पालन नहीं करते, उन्हें सब प्रकार के ज्ञान में भ्रमित, विवेकहीन और नष्ट हुआ समझो।
व्याख्या
पिछले श्लोक में श्रद्धा से मत का पालन करने वालों की बात थी; यहाँ कृष्ण उनके विपरीत उन लोगों की बात करते हैं जो उसमें दोष निकालते हुए (असूया) उसे ठुकराते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे लोग सब ज्ञान के विषय में भ्रमित और विवेक (चेतस्) से रहित होकर भटक जाते हैं। यहाँ 'मत' से आशय अनासक्त भाव से कर्म करने और उन्हें भगवान को अर्पित करने की शिक्षा से है, जो पिछले श्लोकों में कही गई है।