हे पार्थ! इस प्रकार चलाए गए चक्र के अनुसार जो इस लोक में नहीं चलता, वह पापमय जीवन जीने वाला और इन्द्रियों में ही रमने वाला मनुष्य व्यर्थ ही जीता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण यहाँ परस्पर देने-लेने के चक्र की बात पूरी कर रहे हैं: यज्ञ से संसार चलता है और संसार से हमारा पालन होता है। जो इस चक्र से लेता तो है पर लौटाता कुछ नहीं और केवल इन्द्रिय-सुख (इन्द्रियाराम) में डूबा रहता है, उसे "अघायु" यानी पापमय जीवन वाला कहा गया है, और उसका जीवन व्यर्थ माना गया है। इस "चक्र" का अर्थ टीकाकारों में अलग-अलग है: कुछ इसे वेदविहित कर्मकांड का कर्तव्य मानते हैं, तो कुछ सबके हित के लिए किया गया निःस्वार्थ कर्म।