ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ |śraddhāvanto'nasūyanto mucyante te'pi karmabhiḥ ||
जो मनुष्य श्रद्धा रखते हुए और दोष-दृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सब कर्म मुझे समर्पित करके, आशा और ममता छोड़कर युद्ध करो। यहाँ वे बताते हैं कि जो लोग श्रद्धा के साथ और बिना दोष निकाले (अनसूया) इस शिक्षा पर निरंतर चलते हैं, वे कर्मों के फल-बंधन से छूट जाते हैं। यहाँ 'मुक्ति' का अर्थ कर्म के बंधनकारी प्रभाव से छुटकारा है। अद्वैत परंपरा इसे चित्तशुद्धि के द्वारा ज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्ग मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे भगवान के प्रति समर्पण और भक्ति के रूप में पढ़ती हैं।