यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna |karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||
परन्तु हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति छोड़कर, कर्मेन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आरम्भ करता है, वही श्रेष्ठ है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में उस व्यक्ति का वर्णन था जो शरीर से कर्म रोक लेता है, पर मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है। उसके विपरीत, यहाँ कृष्ण ऐसे व्यक्ति को श्रेष्ठ कहते हैं जो मन से इन्द्रियों को संयमित रखता है और आसक्ति (सङ्ग) के बिना कर्म करता है। इसी को कर्मयोग कहते हैं, यानी फल से चिपके बिना कर्म करने का अभ्यास।