प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यज्ञ की भावना से किया गया निःस्वार्थ कर्म क्यों महत्त्वपूर्ण है। वे निर्भरता की एक शृंखला बताते हैं: प्राणी अन्न पर, अन्न वर्षा पर, वर्षा यज्ञ पर और यज्ञ कर्म पर निर्भर है। भाव यह है कि मनुष्य का कर्म संसार की बड़ी व्यवस्था से जुड़ा है। परंपराओं में मतभेद है कि यहाँ 'यज्ञ' वैदिक अनुष्ठान ही है या अर्पण-भाव से किया गया हर कर्तव्य; अगले श्लोक में यही शृंखला आगे बढ़ती है।