हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को चाहिए कि वह आसक्ति से रहित होकर, लोक को सही मार्ग पर बनाए रखने की इच्छा से कर्म करे।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को कर्म का उपदेश दे रहे हैं और अभी कह चुके हैं कि वे स्वयं कर्म करते रहते हैं, ताकि संसार न बिखरे। यहाँ वे कहते हैं कि अज्ञानी कर्म में आसक्ति (सङ्ग) के कारण कर्म करते हैं, जबकि ज्ञानी उतनी ही लगन से, पर आसक्ति के बिना कर्म करे। लक्ष्य है लोकसंग्रह, यानी लोगों को सँभालना और अपने आचरण से राह दिखाना। व्याख्याकार इसमें कहीं ज्ञानी के कर्तव्य पर, तो कहीं भीतर की अनासक्ति पर अधिक बल देते हैं।