श्रीकृष्ण
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ | sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate ||
श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो आचरण करता है, साधारण लोग भी वही-वही करते हैं। वह जिसे प्रमाण मान लेता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
व्याख्या कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि उसे लोकहित (लोकसंग्रह) को ध्यान में रखकर कर्म करना चाहिए। यहाँ वे कहते हैं कि लोग श्रेष्ठ जनों को आदर्श मानते हैं, इसलिए नेतृत्व करने वाले का आचरण ही सबके व्यवहार की दिशा तय करता है। "प्रमाण" का अर्थ है वह मानक या आधार, जिससे सही-गलत का निर्णय किया जाए।
पिछला श्लोक 3.20 अध्याय 3 · कर्म का मार्ग अगला श्लोक 3.22
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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