कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ |lokasaṃgrahamevāpi saṃpaśyankartumarhasi ||
जनक आदि ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई थी। संसार को संभाले रखने का भी ध्यान रखते हुए तुम्हें कर्म करना ही उचित है।
व्याख्या
अर्जुन कर्म छोड़ना चाहता है, इसलिए कृष्ण राजा जनक जैसे ज्ञानी शासकों का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए ही सिद्धि (संसिद्धि) पाई। वे कर्म का दूसरा कारण भी बताते हैं: समाज का हित और उसे धारण करना (लोकसंग्रह), जो अच्छे उदाहरण पर निर्भर है। कुछ टीकाकार यहाँ सिद्धि को अनासक्त कर्म से मिलने वाला मोक्ष मानते हैं, तो कुछ इसमें सामाजिक कर्तव्य का अपना महत्त्व भी देखते हैं।