जो करुणा से भर गया था, जिसकी आँखें आँसुओं से भरी और व्याकुल थीं और जो विषाद में डूबा हुआ था, उस अर्जुन से मधुसूदन ने ये वचन कहे।
व्याख्या
संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि अध्याय 1 के अंत में अर्जुन की दशा कैसी थी: अपने ही संबंधियों से युद्ध करने की सोचकर वह करुणा (कृपा) और शोक से भर गया और उसने धनुष रख दिया। मधुसूदन, यानी मधु दैत्य को मारने वाले, कृष्ण का नाम है; अब वे बोलना शुरू करते हैं। यहीं से कृष्ण का उपदेश आरंभ होता है, जिसका पहला वाक्य अगले श्लोक में अर्जुन की हताशा को फटकारता है।