हे भरतवंशी! दोनों सेनाओं के बीच विषाद में डूबे उस अर्जुन से हृषीकेश ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे।
व्याख्या
संजय धृतराष्ट्र को, जिन्हें वे भारत कहकर पुकारते हैं, युद्धभूमि का वृत्तांत सुना रहे हैं। अर्जुन "मैं युद्ध नहीं करूँगा" कहकर चुप हो गया था, तब हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी) कृष्ण उसे उत्तर देने लगते हैं। "मानो मुस्कुराते हुए" (प्रहसन्निव) से अर्जुन के विषाद के सामने कृष्ण की शांत, सहज मुद्रा का संकेत मिलता है। यह श्लोक केवल भूमिका है; कृष्ण का उपदेश अगले श्लोक से शुरू होता है।