जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca |tasmādaparihārye'rthe na tvaṃ śocitumarhasi ||
जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर चुका है, उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए जो टाला नहीं जा सकता, उस विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, जो अपने ही संबंधियों से युद्ध करने की सोचकर शोक में डूबा है। पिछले श्लोक के बाद वे यहाँ जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) की अनिवार्यता बताते हैं, जिसे कोई टाल नहीं सकता, इसलिए शोक व्यर्थ है। परंपराओं में बल अलग-अलग है: कुछ भाष्यकार इसमें पुनर्जन्म के सिद्धांत को प्रमुख मानते हैं, तो कुछ परिवर्तन की सामान्य अनिवार्यता को।