इसलिए, हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से हर प्रकार से रोक ली गई हैं, उसी की प्रज्ञा स्थिर और प्रतिष्ठित होती है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से बोल रहे हैं और पिछले श्लोक की बात का निष्कर्ष देते हैं: जो मन भटकती इन्द्रियों के पीछे चलता है, वह प्रज्ञा को वैसे खो देता है जैसे हवा नाव को बहा ले जाती है। यहाँ वे कहते हैं कि जिसने इन्द्रियों को उनके विषयों से सब प्रकार से रोक लिया है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। परम्पराएँ इस पर भिन्न मत रखती हैं कि यह संयम सजग प्रयास है या आत्मज्ञान से स्वतः आने वाली निवृत्ति, पर सभी स्थिर प्रज्ञा को इसका फल मानती हैं।