जो असंयमी है, उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती, और असंयमी में एकाग्र चिंतन भी नहीं होता। एकाग्र चिंतन के बिना शांति नहीं मिलती, और जो अशांत है, उसे सुख कहाँ से मिलेगा?
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि इन्द्रियों पर संयम क्यों ज़रूरी है। जो अयुक्त है, यानी योग में स्थित नहीं और असंयमी है, उसमें स्थिर बुद्धि और निरंतर चिंतन (भावना) नहीं होता; इनके बिना शांति नहीं, और शांति के बिना सुख नहीं। भावना को कुछ व्याख्याकार आत्म-ध्यान मानते हैं, तो कुछ भक्ति या दृढ़ अंतःसंकल्प।