न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ |na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param ||
ऐसा कभी नहीं था कि मैं न रहा होऊँ, या तुम न रहे हो, या ये राजा लोग न रहे हों। और न ही ऐसा होगा कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे।
व्याख्या
अर्जुन अपने स्वजनों को मारने की सोचकर शोक में डूबा है, और कृष्ण अपना उपदेश आगे बढ़ाते हैं। पिछले श्लोक में ज्ञानियों के शोक न करने की बात कहकर वे अब कहते हैं कि वे स्वयं, अर्जुन और ये सब राजा सदा से हैं और सदा रहेंगे। यहाँ जो अनेकता दिखती है, उसके स्वरूप पर परंपराओं के मत अलग हैं: अद्वैत जीवों के भेद को केवल व्यवहार के स्तर पर सत्य मानता है, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत उसे स्थायी और वास्तविक मानते हैं।