अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
acchedyo'yamadāhyo'yamakledyo'śoṣya eva ca |nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo'yaṃ sanātanaḥ ||
यह आत्मा काटी नहीं जा सकती, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती और सुखाई भी नहीं जा सकती। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
व्याख्या
अर्जुन के शोक को दूर करने के लिए कृष्ण पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हैं। वे बताते हैं कि आत्मा पर शस्त्र, अग्नि, जल और वायु जैसे भौतिक तत्त्वों का कोई असर नहीं होता, और वह समय से परे सदा रहने वाली है। "सर्वव्यापी" का अर्थ अद्वैत परंपरा में सब जगह फैली एक ही सत्ता है, जबकि विशिष्टाद्वैत जैसी परंपराएँ इसे इस रूप में समझती हैं कि आत्मा हर प्रकार की देह और अवस्था में प्रवेश कर सकती है।