इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
indriyāṇāṃ hi caratāṃ yanmano'nuvidhīyate |tadasya harati prajñāṃ vāyurnāvamivāmbhasi ||
क्योंकि विषयों में भटकती हुई इंद्रियों के पीछे जब मन चल पड़ता है, तब वह उस मनुष्य की प्रज्ञा को वैसे ही हर लेता है, जैसे जल पर चलती नाव को हवा बहा ले जाती है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि असंयमी व्यक्ति को शांति क्यों नहीं मिलती। जब मन विषयों में घूमती इंद्रियों के पीछे लग जाता है, तो वह विवेकपूर्ण प्रज्ञा को वैसे ही बहा ले जाता है, जैसे तेज़ हवा नाव को रास्ते से भटका देती है। यही बात अगले श्लोक में इंद्रिय-संयम से स्थिर प्रज्ञा तक पहुँचती है।