जो देहधारी विषयों का सेवन छोड़ देता है, उससे विषय तो दूर हो जाते हैं, पर उनका रस बना रहता है; परम तत्त्व को देख लेने पर उसका वह रस भी मिट जाता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कछुए की उपमा से इंद्रियों को समेटने की बात कही थी। यहाँ वे बताते हैं कि केवल विषयों से दूर रहने से काम पूरा नहीं होता, क्योंकि भीतर रस, यानी स्वाद या लालसा, बची रहती है; वह तभी मिटती है जब परम का साक्षात्कार होता है। 'निराहार' को कुछ टीकाकार इंद्रियों को विषयों से हटाने के अर्थ में लेते हैं, तो कुछ उपवास जैसे बाहरी तप के अर्थ में। 'परम' को अद्वैत परंपरा आत्मा या ब्रह्म के रूप में समझती है, जबकि भक्ति परंपराएँ उसे परमेश्वर के रूप में पढ़ती हैं।