हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चय करने वाली बुद्धि एक ही होती है। पर जिनमें निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से कर्मयोग की बात कर रहे हैं, जिसका थोड़ा-सा अभ्यास भी बड़े भय से बचाता है। वे एक ही स्पष्ट लक्ष्य पर टिकी निश्चयात्मक बुद्धि की तुलना अनिश्चय वाले लोगों के बिखरे हुए मन से करते हैं, जो अनगिनत दिशाओं में भटकता है। वह एक लक्ष्य क्या है, इस पर टीकाकार भिन्न मत रखते हैं: कई इसे मोक्ष या आत्मज्ञान के प्रति स्थिर निष्ठा मानते हैं, और कई अनासक्त भाव से कर्तव्य-पालन का दृढ़ संकल्प।