जो असत् है, उसका कोई अस्तित्व नहीं होता, और जो सत् है, उसका कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का यह निष्कर्ष तत्त्व को देखने वालों ने देखा है।
व्याख्या
कृष्ण शोक में डूबे अर्जुन को सिखा रहे हैं कि स्थायी और अस्थायी में क्या भेद है। असत् वह है जो बदलता और नष्ट होता है, जैसे शरीर। सत् वह है जिसका कभी अभाव नहीं होता, जिसे अगले श्लोकों में आत्मा से जोड़ा गया है। अद्वैत परंपरा इसे परम सत्य का कथन मानती है, जबकि अन्य परंपराएँ इसे नित्य आत्मा और परिवर्तनशील जड़ पदार्थ के भेद के रूप में पढ़ती हैं।