हे पार्थ, जो अविवेकी लोग वेदों के शब्दों में ही रमे रहते हैं, वे यह कहते हुए कि “इससे बढ़कर और कुछ नहीं है,” ये फूल-सी सजी हुई बातें कहा करते हैं…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से उन लोगों की बात कर रहे हैं जिनकी बुद्धि बिखरी हुई है, जबकि पिछले श्लोक में एकनिष्ठ निश्चयात्मक बुद्धि (व्यवसायात्मिका बुद्धि) की बात थी। वे अविवेकी (अविपश्चित्) लोगों का वर्णन करते हैं, जो वेदवाद में रमकर अलंकृत भाषा में फलों का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि इससे श्रेष्ठ कुछ नहीं। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है। परंपराओं में मतभेद है कि यह वेदों के कर्मकांड भाग की ही आलोचना है या केवल फल-कामना से किए गए संकीर्ण उपयोग की।