हे पार्थ, जब मनुष्य मन में उठने वाली सारी कामनाओं को पूरी तरह छोड़ देता है और अपने आप में ही, अपने द्वारा ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में अर्जुन ने पूछा था कि स्थितप्रज्ञ, यानी स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति, की पहचान क्या है; कृष्ण यहाँ उसका उत्तर देना शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति मन में उठने वाली सभी कामनाओं (काम) को छोड़ देता है और बाहरी वस्तुओं में नहीं, अपने भीतर आत्मा में संतुष्ट रहता है। आत्मा के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: अद्वैत इसे अपना सच्चा स्वरूप मानता है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे ईश्वर के साथ अपने संबंध में आनंद पाने वाली जीवात्मा के रूप में समझती हैं।