अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
atha caittvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi |tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||
पर यदि तुम धर्म के अनुकूल इस युद्ध को नहीं लड़ोगे, तो अपने स्वधर्म और अपनी कीर्ति को छोड़कर पाप के भागी बनोगे।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए अब न लड़ने के परिणाम बताते हैं। यहाँ धर्म का अर्थ है उचित और न्यायसंगत कर्म, और स्वधर्म का अर्थ है अपनी भूमिका का कर्तव्य, जो अर्जुन के लिए क्षत्रिय का कर्तव्य है। उसे छोड़ने पर अर्जुन की प्रतिष्ठा भी जाएगी और वह पाप, यानी नैतिक दोष, का भागी भी होगा। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ इसे सामाजिक कर्तव्य का आह्वान मानती हैं, तो कुछ अनासक्त भाव से कर्म करने का।