श्रीकृष्ण
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate | kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ||
हे पार्थ, इस कायरता को मत अपनाओ; यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठ खड़े हो, हे परंतप।
व्याख्या अर्जुन युद्धभूमि में विषाद से टूट गया है, तब कृष्ण उसे इस कायरता (क्लैब्य) से उबरने को कहते हैं। वे इसे हृदय की तुच्छ दुर्बलता (हृदयदौर्बल्य) कहते हैं, जो अर्जुन जैसे योद्धा के योग्य नहीं है। 'पार्थ' (पृथा यानी कुंती का पुत्र) और 'परंतप' (शत्रुओं को तपाने वाला) संबोधन उसे उसके कुल और सामर्थ्य की याद दिलाते हैं।
पिछला श्लोक 2.2 अध्याय 2 · ज्ञान का मार्ग अगला श्लोक 2.4
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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