जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, जो सुखों में लालसा नहीं रखता, और जो राग, भय तथा क्रोध से मुक्त हो चुका है, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।
व्याख्या
अर्जुन के स्थितप्रज्ञ के बारे में पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण यहाँ मुनि, यानी मननशील व्यक्ति, का वर्णन करते हैं। वह सुख और दुःख दोनों में सम रहता है और आसक्ति (राग), भय तथा क्रोध से मुक्त होता है। इसका अर्थ भावशून्यता नहीं, बल्कि भीतरी स्थिरता है, जिसमें बाहरी घटनाएँ मन को अपने वश में नहीं करतीं।