avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam |vināśamavyayasyāsya na kaścit kartumarhati ||
पर उसे अविनाशी जानो, जिससे यह सब कुछ व्याप्त है। इस अक्षय तत्त्व का विनाश कोई भी नहीं कर सकता।
व्याख्या
अर्जुन के शोक को दूर करने के लिए कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि क्या सच में स्थायी है और क्या नश्वर। वे उस अविनाशी तत्त्व की ओर संकेत करते हैं जो पूरे जगत में व्याप्त है और जिसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। अधिकतर परंपराएँ इसे आत्मा मानती हैं; अद्वैत इसे सबमें व्याप्त एक ब्रह्म के रूप में पढ़ता है, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसी आस्तिक परंपराएँ जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न किंतु उस पर आश्रित मानती हैं।