क्रोध से मोह पैदा होता है, मोह से स्मृति भटक जाती है, स्मृति के भटकने से बुद्धि नष्ट हो जाती है, और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि विषयों का चिंतन करने वाला मन कैसे क्रमशः गिरता जाता है; कामना से क्रोध आता है और आगे यही शृंखला चलती है। क्रोध से विवेक पर मोह (संमोह) छा जाता है, फिर व्यक्ति अपनी सीख और मूल्यों (स्मृति) को भूल जाता है, और अंत में सही-गलत पहचानने की शक्ति (बुद्धि) खो देता है। अंतिम शब्द 'प्रणश्यति' का सामान्य अर्थ पूर्ण विनाश है; टीकाकार इसे आध्यात्मिक पतन या जीवन के सच्चे लक्ष्य से चूकना, दोनों रूपों में समझते हैं।