यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati |tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca ||
जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर जाएगी, तब जो कुछ सुनने योग्य है और जो कुछ सुना जा चुका है, उसके प्रति तुम उदासीन हो जाओगे।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जब विवेक-बुद्धि मोह, यानी भ्रम और उलझन, से बाहर निकल आती है, तब मन में कैसा बदलाव आता है। तब व्यक्ति सुनी-सुनाई बातों और आगे सुनी जाने वाली बातों, दोनों से आसक्ति छोड़ देता है। 'निर्वेद' का अर्थ वैराग्य या उदासीनता है। कुछ व्याख्याकार इसे वेदोक्त कर्मों के फलों और स्वर्ग आदि के सुखों से विरक्ति मानते हैं, और कुछ इसे आत्मज्ञान हो जाने पर शास्त्र-श्रवण की अपेक्षा न रहना मानते हैं।